Sunday, January 14, 2018

समकालीन मैथिल राजनीतिक संस्कृति आ' मैथिली

  कोनो राष्ट्र, राज्य, क्षेत्र वा समूहक विकास ओकर राजनीतिक संस्कृतिक अनुरूपे होइत छैक | हमरा लोकनि ई कहैत अघाइत नहि छी जे मैथिली अत्यंत समृद्ध भाषा अछि, एकर साहित्यिक इतिहास प्राचीन अछि , भाषा-शास्त्रीय आधार पर भारतीय संविधानक अष्टम अनुसूची मे एकरा स्थान भेटबाक चाही एवं ई तीन कोटि व्यक्तिक मातृभाषा अछि |
सब बात ठीके छैक तथापि मैथिलीक स्थान पर उर्दू के बिहारक द्वितीय राजभाषा घोषित क' देल गेल, कतेको आश्वासनक उपरान्तो संविधानक अष्टम अनुसूची मे स्थान नहि भेटल आ' जेहो किछु भेटल अछि तकरो छीन लेबाक कुचक्र चलिते रहैत अछि| आखिर कियैक? की कारण छैक जे जत' मैथिलीक सहोदरा  - बंगला , आसामी, उड़िया  - के संविधान द्वारा मान्यता प्रदान कयल गेल अछि ओतय संविधान लागू हेबाक ३९ साल बादो मैथिली के भारतीय भाषाक रूप मे मोजर नहि भेटलैक अछि ? उपर्युक्त प्रश्नक उत्तरक लेल हमरा लोकनि के मैथिल राजनीतिक संस्कृति के बुझय पड़त आ' ओहि संस्कृतिक निष्क्रियात्मक तत्त्व के दूर करबाक प्रयत्न कर' पड़त |
राजनीतिक संस्कृति की थिक ?
राजनीतिक संस्कृति एकटा आधुनिक शब्द अछि जे राजनीतिक विचारधारा, राष्ट्रीय लोकाचार एवं भावना , राष्टीय राजनीतिक मनोविज्ञान एवं लोकक आधारभूत मूल्य सन प्रचलित अवधारणा के स्पष्ट एवं व्यवस्थित करबाक प्रयत्न करैत अछि | राजनीतिक संस्कृति राजनीतिक व्यवस्था एवं राजनीतिक मुद्दा सं संबंधित समाजक अभिवृत्ति, विश्वास, मनोभाव आ' मूल्य सं गठित होइत अछि| दोसर शब्द मे समाजक सामान्य संस्कृतिक किछु पक्ष एहि बात सं विशेष रूप सं संबंधित रहैत अछि कि शासनक संचालन केना हेबाक चाही एवं शासन की सब करबाक प्रयत्न करत! संस्कृतिक यैह पक्ष राजनीतिक संस्कृति अछि |
राजनीतिक संस्कृति सामान्यतः तीन प्रकारक मानल गेल अछि  - संकीर्ण , प्रजभावी आ' सहभागी | संकीर्ण राजनीतिक संस्कृतिक लोक अप्पन,अपन परिवार, जाति, वा कबीलाक सीमा मे समटल रहैत अछि | ओकरा दुनिया वा व्यापक सामाजिक समस्या सब सं कोनो मतलबे नहि रहैत छैक | प्रजाभावी राजनीतिक संस्कृतिक लोक राजनीतिक - सामाजिक समस्या सं अवगत रहैत अछि आ' ओकर समाधान सेहो चाहैत अछि | मुदा ओ हरदम राज्यापेक्षी / अन्यापेक्षी होइत अछि | ओकरा राजनीतिक लाभ तं चाही , मुदा कियो ओकरा ओ लाभ द' दौक, ओहि लेल ओ क्रियाशील प्रयत्न नहि करत | जेना प्रजा राजा सं अपेक्षा रखैत अछि, तहिना प्रजाभावी राजनीतिक संस्कृतिक लोक शासक वर्ग सं अपेक्षा रखैत अछि जे ओ ओकर इच्छा बुझौक आ' ओकरा पूरा क' दौक | सहभागी संस्कृतिक लोक सक्रिय राजनीतिक भागीदारी द्वारा अपन इच्छा पूरा करबैत अछि |
दुनियाक कोनो देशक राजनीतिक संस्कृति उपर्युक्त तीनू वर्ग मे सं कोनो एकक शुद्ध रूप नहि अछि | सब ठाम एकर मिश्रित रूप पाओल जाइत अछि | महत्त्व एहि बातक छैक जे मिश्रण कहें छैक ! मिथिलाक राजनीतिक संस्कृति संकीर्ण आ' प्रजाभावीक मिश्रण अछि | जावत धरि राजतन्त्र छलैक तावत धरि मिथिला के एहि सं बहुत हानि नहि भेलैक, मुदा लोकतंत्र एहि प्रकारक राजनीतिक संस्कृति आत्मघाती होइत अछि | जाति व्यवस्थाक कारणे मैथिल अपना के जाति, टोल, गाम आ' मण्डली मे आबद्ध केने रहि गेलाह जकर परिणामस्वरूप मैथिलक अस्मिता ओहि प्रकारक नहि बनलैक जाहि प्रकारक बंगाली, आसामी, उड़िया, गुजराती, पंजाबी वा सिंधीक बनलैक | दुर्योग सं मैथिल ब्राह्मणक एकटा भेद सेहो अछि जाहि चलते मैथिल सं मिथिलावासीक बोध नहि भ' मात्र ब्राह्मणक बोध होमय लगलैक|
राजनीतिक संस्कृति सामान्य संस्कृति सं प्रभावित रहैत अछि | सामान्य मैथिल संस्कृति सहभागी संस्कृतिक पोषक नहि अछि | बच्चे सं हमरा लोकनि के सिखायल जाइत अछि :" भोजक आगु , रणक पाछु" रहबाक चाही |
रणक पाछु रहबाक शिक्षा अत्यंत भयावह अछि | हमरा लोकनि रण के खराप नहि मानैत छी| राम, कृष्ण आ' दुर्गाक पूजा करैत छी कियैक त' रण मे ओ लोकनि अपन पराक्रम देखा विरोधी के समूल नष्ट क' देलन्हि | हम मात्र एतबे चाहैत छी जे रण मे हम, हमर अप्पन, हमर बल-बच्चा आगू नहि जाइ  | ई शिक्षा क्रियाशीलताक विरोधी अछि|
लोकतांत्रिक राजनीतिक स्थिति युद्धे जकाँ होइत छैक | जहिना युद्धक किछु नियम होइत छैक , विजय-पराजय होइत छैक, संधि-विग्रह होइत छैक तहिना लोकतांत्रिक राजनीतिक सेहो किछु नियम छैक, विजय-पराजय होइत छैक, संधि-विग्रह होइत छैक | अंगरेजी मे एकटा कहबी छैक - " There is nothing for nothing". अर्थात प्रत्येक वस्तु , उपलब्धिक किछु मूल्य होइत छैक, मंगनी मे किछु नहि भेटैत छैक | जं हमरा लोकनि किछु प्राप्त कर' चाहैत छी त' ओकर मूल्य चुकबहि पड़त, किछु व्यक्तिगत हानिक संभावना स्वीकार करहि पड़त | मुदा हमरा लोकनि सब किछु बिना प्रयासेक प्राप्त कर' चाहैत छी , ओहि लेल उद्यम कर' सं कन्नी काटि लेत छी | एहना स्थिति मे जं हम ई आशा करी जे हमर अस्मिता बाँचल रहत, हमर भाषा आ' संस्कृति के आदर भेटत तं ई मात्र दिवास्वप्न हएत|
दुर्भाग्यवश हमर परंपरा हमरा सब के अन्यापेक्षी भेनाइ सिखबैत अछि| चौदहम शताब्दीक राजनीतिक प्रकांड मैथिल पंडित चण्डेश्वर ठाकुर अपन ग्रन्थ 'राजनीति रत्नाकर' मे कहैत छथि जे " जं राजा रक्षा नहि करय तं प्रजाक नाश भ' जेतैक आ' प्रजा मे वितृष्णा उत्पन्न भ' जेतैक आ' एहि प्रकारे ओकर विनाश होमय लगतैक"| १ |  एहि ठाम हमर विरोध मात्र एतबे सं अछि जे अपना रक्षाक लेल हम अपनो कियैक ने उपाय करी, अनके पर कियैक निर्भर रही ! हम कोनो अपाहिज नहि छी जे आने हमरा लेल सब काज क' दिअय | दुर्भाग्यवश हमरा लोकनिक व्यवहार अपहिजे जकां होइत अछि|
हम बिहार सरकार डिस टकटकी लगेने रहैत छी जे ओ मैथिली के बिहारक द्वितीय राजभाषा घोषित क' दौक, बिहार लोक सेवा आयोगक सब परीक्षा में मैथिली के स्थान द' दौक, राज्यक सब विश्वविद्यालय मे मैथिलीक पढौनी शुरू क' दौक आ' केंद्र सरकार पर जोर दौक जे ओ मैथिली के संविधानक अष्टम अनुसूची मे जोड़य |
हम सब ई विसरि जाइत छी जे लोकतंत्र मे सरकार जनताक आकांक्षा के बेसी दिन धरि उपेक्षित नहि राखी सकैत अछि, मुदा से तखन जखन जनताक आकांक्षा वास्तविक होइक | वास्तविक आकांक्षाक तात्पर्य जे ओकरा प्राप्त करबाक लेल लोक सक्रिय प्रयत्न करय, किछु हानि सह्बाक लेल तैयार रहय| मुदा हमरा लोकनि तं हरदम अन्यापेक्षी रहैत छी | कखनो स्वर्गीय जनाकीनंदन सिंह, कखनो डॉक्टर जयकांत मिश्र, कखनो हरिनाथ मिश्र त' कखनो डॉक्टर जगन्नाथ मिश्र दिस तकैत रहैत छी, कखनो अपने किछु नहि कर' चाहैत छी |
एहि ठाम ई स्पष्ट क' देनाई आवश्यक जे ई बात नहि छैक जे सब मैथिल हरदम भाषाक प्रश्न पर निष्क्रिये रहलाह अछि - ज्योतिरीश्वर आ' विद्यापति ' दुर्जनक उपहासक' चिंता केने बिना मातृभाषा के समृद्ध करबाक प्रयत्न केलन्हि जकर परिणाम भेल जे मध्ययुग मे मैथिली संपूर्ण पूर्वी भारतक साहित्यिक भाषा त' बनिये गेल छल, नेपालक मल्ल रजक दरबारक भाषा सेहो भ' गेल | २| कहल जाईत अछि जे बंगला रामायाणक रचयिता कृत्तिवास ओझा मैथिल छलाह रचना त' अपना भाषा मे केलन्हि मुदा अपनाओल बंगालीक द्वारा गेलाह|
 १९म शताब्दीक अंतिम आ' २०म शताब्दीक आरंभिक काल जे भारतीय साहित्यक पुनर्जागरण काल मानल जाइत अछि मैथिली के ओहि प्रकारें उद्वेलित नहि कयलक जाहि प्रकारे ओ बंगला आ' अन्य भारतीय भाषा के कयलक| प्रकाण्ड मैथिल पण्डित लोकनि संस्कृतहि मे रचना करैत रहलाह, मैथिली सामान्य जनताक लेल छोडि देल गेलैक| कोनो आश्चर्य नहि जे मैथिली कोनो बंकिमचंद्र , शरतचंद्र चट्टोपाध्याय , रवीन्द्रनाथ ठाकुर, बाल गंगाधर तिलक , सुब्रमनियम भारती आ' महात्मा गाँधी उत्पन्न नहि क' सकल | उपर्युक्त सब प्रातःस्मरणीय महापुरुष अपन रचना अपना मातृभाषे मे करैत छलाह |
सक्रिय राजनीति सं फराक रहबाक प्रवृत्तिक चलते राष्ट्रीय आंदोलन मे मैथिल अपन कोनो विशिष्ट स्थान नहि बना सकलाह | स्वाभाविक छल जे संविधान सभा मे सेहो मैथिलक उपस्थिति नगण्य रहल | ओतय मैथिलीक लेल बाज' वला के रहैत ?
स्वतन्त्रताक पश्चात किछु उत्साही मैथिल ई अनुभव केलन्हि जे स्वतंत्रता मात्र विदेशी शासन सं मुक्ति नहि, अपितु अपन व्यक्तित्व, अपन भाषा, आ' सांस्कृतिक विकासक अवसरक उपलब्धिक नाम अछि | ओ लोकनि, जाहि मे बेसी प्रवासी मैथिल छलाह, मैथिलीक प्रश्न पर अपना के संगठित करबाक प्रयत्न करय लगलाह | संगठन बन' लागल, मुदा संकीर्ण राजनीतिक संस्कृतिक प्रभावे ओ संगठन सब बनितहि विभाजितो होमय लागल| तीन तिरहुतिया तेरह पाकक अनुरूपे संगठन कुम्ही जकाँ पसरय लागल, आधारविहीन रूपे| एक- दिवसीय, द्वि-दिवसीय वा त्रि-दिवसीय पर्व समारोह मना लेनाई आ' किछु प्रस्ताव पारित क' लेनाई एहि संगठन सबहक जीवन ध्येय भ' गेलैक | एहि मे कोनो संदेह नहि जे एहि प्रयास सं प्रवासी मैथिल मे भाषाक प्रति किछु जागरूकता अयलनि, मुदा मैथिल समाजीकरणक प्रभावें ओ जागरूकता सक्रियात्मक नहि बनि सकल|
प्रवासी मैथिल संगठन सब पारस्परिक विद्वेष आ' कलह सन ग्रसित रहबाक कारणे बहुत प्रभावकारी नहि बनि सकल | एकटा विदेशी विद्वान अपन शोध द्वारा सिद्ध केलन्हि जे भाषाक प्रचार-प्रसार हेतु निर्मित अधिकांश मैथिल संगठन किछु लोकक निहित स्वार्थक पूर्तिक साधनक रूप मे प्रयुक्त कयल गेल |३|
प्रवासी मैथिल द्वारा जेहो कार्य कयल गेल, मिथिला क्षेत्र मे ओहो नहि कयल जा सकल | एहि स्थिति मे मिथिलाक नेता लोकनि प्रमुख भूमिकाक निर्बाह क' सकैत छलाह | नेता नेतृत्व दैत अछि, जनता कें प्रबुद्ध करैत अछि | मुदा मिथिलाक राजनीतिक नेता लोकनि खाली गद्दीक लडाईक जोड़-तोड़ मे लागल रहलाह, मैथिली डिस हुनकर ध्याने नहि गेलन्हि | अचेतन जनता आ' अकुशल राजनीतिक नेतृत्व मैथिलीक लेल घातक सिद्ध भेल | मैथिल अस्मिताक निर्माण नहि भ' सकल | उपनिवेशवादी प्रवृत्तिक अनुरूपे तथाकथित मैथिल प्रबुद्ध वर्ग शासक वर्गक भाषा आ' संस्कृतिक अनुकरण कर' लागल| परिणामस्वरूप आइ मैथिली आंदोलनक नेता लोकनिक घर मे सेहो धिया-पूता हिंदी बजैत छन्हि आ' नेता लोकनि एहि पर गौरवान्वित होइत छथि | जखन हम घरो मे मैथिली नहि बाजब तखन हम मैथिली पढ़ब कियैक, मैथिलीक पुस्तक-पत्रिका किनब कियैक? एहेन स्थिति मे प्रकाशक मैथिलीक पोथी - पत्रिका छपत कियैक ? एहि दुश्चक्र (vicious circle) सं मैथिली के निकालनाइ अत्यंत कठिन अछि |
मैथिल राजनीतिक संस्कृतिक उपर्युक्त संक्षिप्त आ' अपूर्ण विवेचन एहि तथ्य कें स्पष्ट करैत अछि जे मैथिलीक वर्तमान स्थितिक लेल मिथिलाक सामान्य संस्कृतिक संग राजनीतिक संस्कृति सेहो उत्तरदायी अछि| जं हम एहि स्थिति सं मैथिली के निकालय चाहैत छी तं हमरा लोकनि के अपन समाजीकरणक ढाँचा बदलय पड़त जाहि सं मिथिलाक राजनीतिक संस्कृति संकीर्ण - प्रजाभावीक स्थान पर सहभागी बनि सकय | एलिस आयरन डेविसक मत छन्हि जे मैथिली अत्यंत सम्मानित भाषा अछि| 4|, अपना प्रयास सं हमरा लोकनि के एहि विदेशी विदुषीक विश्वास कें सत्य सिद्ध करबाक प्रयत्न करबाक चाही|
१ - अरक्षणे प्रजाक्षैण्यविरागभागधेयभङ्गंप्रसङ्गात  ,  राजनीति रत्नाकर, ( वाराणसी, १९७० ) पृष्ठ १७
२ - Alice Irene Davis, Basic Colloquial Maithili (Delhi, 1984) p. x1
3 - Paul Brass, Language and Politics in North India ( London, 1974)
४  - Alice Irene Davis, ओत्तहि 

Thursday, December 28, 2017

Origins of Panchayati Raj in India: Contribution of Maharajah Rameshwar Singh of Darbhanga

In 1911 Panchayati Raj was introduced in a systematic way by the Zamindar Association of Bihar under the leadership of Darbhanga. Its success has been described by late Maharajadhiraja Sir Rameshwar Singh of Darbhanga in following words. It was sought after by many states of India.